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रचना 0352

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अगर .....मेरा आने वाला कल

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अगर .....मेरा आने वाला कल मेरे पिछले कल का.... प्रतिलिपि ही होना है और .... ताउम्र होते ही रहना है तो ......सोचती हूँ .... रुक जाना....... बेहतर है रोज़ ....ख्वाबों को मारने से बेहतर है मैं ......ही इक बार बिखर जाऊँ नयी सोच...... लेकर पुनर्जीवित हो कर देखूं खूब .....सजग हो कर चली थी.... अब तलक अब थोडा भ्रमित होकर देखूं बहुत हुआ .... ख्वाब भी थक गए ..... पलकों और दिल के तहखाने में पड़े पड़े अब के सोचा है ..... इन्हें .......नई सोच और .... नए सच .....के सुपुर्द कर दूं यक़ीनन ..... हर आने वाला कल मेरा है ये ......मेरा नहीं...... मेरे हर ख्वाब का कहना है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें