कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0329

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इज़हार

इज़हार...... चाँद तुम भी न ...... बिलकुल "जीरो बट्टा निल" लगते हो इश्क के मामले में अलग अलग भेस धर के क्या सोचते हो मुझे ठग लोगे तुम ? रात की काली चदरिया ओढ़ लो या तारों वाली अचकन पहन लो अपना स्पर्श कैसे बदल लोगे तुम ? जान छिड़कती है चांदनी मुझ पर राहों में उसकी कैसे दखल दोगे तुम ? लाख छिपाना चाहो ये पैगाम जो तुम मेरे लिए दिन भर छिप छिप कर लिखते हो सूरज की नज़र से बचा बचा कर रखते हो दे क्यों नहीं देते ? कह क्यों नहीं देते ? कब उस जीने से उतर कर नीचे मेरे करीब आओगे तुम ? तुम्हारा हूँ .....कहोगे तुम तुम्हारे लिये रात भर चला हूँ ......कहोगे तुम कह दो न आज ...... आज तो .....बस कह ही दो या उम्र भर मेरे लिए यूँ ही "जीरो बट्टा निल" ही रहोगे ? बस गोल गोल ....चाँद जैसे मेरे लिए ...... चमकते शून्य जैसे कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें