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रचना 0326

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जानती हूँ

जानती हूँ ...... दूर तलक तेरे आकाश में "मैं" कहीं नहीं हूँ फिर भी हर बात पर तेरा मुझे "चाँद" कहना भाता है तेरे करीब और करीब लाता है चाँद और .......रात की तरह लफ्ज़ और ......बात की तरह दिल और जज़्बात की तरह ! © कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें