भाषा / Language
मन बांवरा नहीं
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मन बांवरा नहीं ,
पारदर्शी हो चला है
कुछ गिरहें खोलने ,
कुछ समेटने चला है
आज फिर कुछ कहने ,
कुछ सुनने चला है
फिर चुपचाप उड़ने ,
तुझे छूने चला है
पानी था अब तलक,
आज प्यासा हो चला है
कुछ तुझसे होता हुआ ,
मुझ तक चला है
मैं तुझमें ....मुकम्मल,
मसरूफ ...
तू मुझमें हो चला है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें