कल्पनाशब्दों के बीच
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हर बार नहीं ढल सकती मैं

हर बार नहीं ढल सकती मैं ..... तुम्हारे खूबसूरत साँचे में हर बार नहीं लीप सकती मैं...... तुम्हारे शब्द अपने होठों पर हर बार नहीं ओढ़ सकती मैं..... तुम्हारी सोच अपने वजूद पर बस .....कुछ देर अब ताज़ा हवा भी खाने दो हटाओ अपना बादल मुझसे थोडा सूरज ....मुझ पर भी आने दो ज़िंदा ......मैं भी तो हूँ कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें