भाषा / Language
ये ख़ामोशी
✦
ये ख़ामोशी ......
जब आँखों से बहती है
तो दरिया नहीं बनता
इक सहरा पनपने लगता है
जहाँ एहसास तड़पते रहते हैं
और शब्द उगते ही नहीं
कोई मौसम
कोई मंज़र
सुहाता नहीं इन आँखों को
बस इक तृष्णा......
रिसती जाती है खुद में
बेहद स्वार्थी
हो जाता है मन
बस
अपनी ख़ामोशी को
नोच नोच के
फेंक देना चाहता है
आवारा...
बांवरा .....
जो बना लो
जो कह लो
इस ख़ामोशी से बचने के लिए
उस आसमान तक जाने की जिद्द
हर हद पार कर जाने की जिद्द
उसे खोखला करती जाती है
कि कोई शोर हो अब खुद में
इक आवाज़ गूंजे खुद में
कि मैं अभी ज़िंदा हूँ
आधी आधी नहीं
पूरी पूरी सी
कोई तो होगा .....
मेरी सोच का हमसफ़र
कहीं तो होगी ....
मेरी नाम सी रहगुज़र
कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें