कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0296

भाषा / Language

मुद्दतों बाद

मुद्दतों बाद आज फिर उसी वादी से गुजरे हैं हम यादों का धुंआ उभरा कि कुछ और निखरे हैं हम इक झोंका लिपट गया हम से कि बस दो पल ठहरे हैं हम बड़ी मुश्किल से संभले हुए थे की आज फिर बिखरे हैं हम कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें