कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0286

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सुनो

सुनो.... मुझमें.... यादों का वो दरख़्त ... आज भी ज़िंदा है ...... जो पत्ते तो बदल देता है ..... पर ...मिटटी कभी नहीं बदलता ..... तुमसे लिपटे हुए रहता है ... "हरा"हो या "पीला" ... तुम्हारा हर पत्ता ... पकडे हुए रहता है मेरे यादों का .. दरख़्त ... ज़िंदा है .... © कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें