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रचना 0274

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बड़ी देर से

बड़ी देर से ..... लफ़्ज़ों में ......धागा पिरो रही हूँ कि कुछ लिख सकूँ .... औराक़ पर तुम्हें दिख सकूँ ...... पर ... आज न लफ्ज़ संभल रहे..... न डोर .... इस लिए .... पाती पर मुस्कान बिखेर दी है आज मेरे संग.....कुछ पल .....मुस्कुरा लो ना इन लफ़्ज़ों को ......चिढा दो ना बस यूँ ही ......मेरे लिए © कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें