भाषा / Language
अब की
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अब की ....
"सुन्दर मुरादों" वाले ....
दीपक नहीं खरीदे बाज़ार से
इस बार ....
"सुन्दर इरादों " वाले ....
दीपक मन में गढ़ रही हूँ
उसी से "मन की देहलीज़" सजा रही हूँ ......
साल भर .....झिलमिलाना भी तो है
© कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें