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रचना 0249

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कुछ तस्वीरें

कुछ तस्वीरें ...... रंगीन होकर भी कितनी श्वेत शाम लगती हैं कभी .....पूरी श्वेत कभी...... पूरी श्याम कभी ....रंग हींन सी बस रंगों की परिधि में खड़ी भर रंगों से लीपी हुई रंगों से पुती हुई मूक बधिर सी मुस्कुराती भर कुछ रहता है वो जो अंतस में धड़कता हुआ ......बस वो ही नहीं रंग पाता कोई हर बार कुछ .... आधा रंगा छोड़ जाता कोई उस धनुक सा कभी...... क्षणभंगुर सा रख जाता कोई रंगीन तस्वीर ने ...इक कहानी तक़दीर को सुनाई पहले तो तक़दीर .....मुस्कुराई फिर आंसूं पोंछ .... रंगों की कूंची ..... खुद पर मलने लगी खुद को इक बार और ....... रंगीन करने लगी © कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें