भाषा / Language
खत तो
✦
खत तो ....
कब का पढ़के रख दिया है
किताबों के बीच कहीं .....
बस ....
कुछ एहसास ....
कुछ लफ़्ज़ .....
भूले बिसरे
चले आते है जहन तक
रोज़ .....इक नयी सरसराहट लिए हुए
हुबहु ......तेरी वाली आहट लिए हुए
और ....
वो खत .....
किताब के महकते हर्फ़ से
रोज़ ही लिपटता है
कहता जाता है......
अपनी रूह की
अंतर्मन की
© कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें