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रचना 0240

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अतीत के कुछ पन्ने

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अतीत के कुछ पन्ने कितने नुकीले होते हैं नश्तर से.... बार बार घाव देने वाले लाख जतन करो कि....परे हो जाएँ ये मेरे सुनहरे वर्तमान से नज़र न आएं ज़िन्दगी को बस रहे अनजान से पर ये क़ातिल जो ठहरे जीने कहाँ देंगे मुझको मैं चाहूँ न चाहूँ , होना इनसे राब्ता ये जानते हैं ,कैसे रोकना है मेरा रास्ता काश नोच सकती ये कालापन ये दोगलापन इन पन्नो से कि ......निखर आती मेरी भी इक तस्वीर उजली सी कुछ पल ....दर्द के कुछ ......पश्चाताप के कुछ .....भूल से कुछ .....उल जुलूल से गूँज कर लौट आते हैं अब तलक और लिपट जाते हैं कुछ दाग मुझपर बेधड़क अतीत के कुछ पन्ने फड़फड़ाते हैं बहुत बुझ गए हैं फिर भी लपलपाते हैं बहुत © कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें