भाषा / Language
मुठ्ठी भर आकाश नहीं ,पूरा आसमान लूं
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मुठ्ठी भर आकाश नहीं ,पूरा आसमान लूं
सूरज से उस की , उजाले वाली दुकान लूं
रात ,लिखा करूँ ,तारों पर अपनी दास्तान
इसलिए, चाँद से वो खाली खाली मकान लूं
कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें