भाषा / Language
खाली बैठी थी
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खाली बैठी थी .....
सोचा .....
बेनाम लम्हों की
झाड़फूँख ही कर लूं
भरा मन .....खाली ही कर लूं
बस ....
अभी हाथों में धरे ही थे ....ये बैरंग लम्हें
कुछ एहसास ....
टूट टूट कर झरने लगे
हाथ बढ़ाये तो .......
पहलु में भरने लगे
"तुम ऐसे तो ना थे " ......कहने लगे
फिर ....रुके कहाँ ?
बस बहने लगे
"गीली रूह .......मन भीगे "
"बेनाम लम्हे ......सीले सीले "
कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें