कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0228

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"चर्चा" होता रहे मेरा

"चर्चा" होता रहे मेरा .... ऐसा मैं क्या करता रहूंगा ? "धर्म" ...... "इंसा" से पूछ बैठा इक दिन इंसा ..... कुछ देर मुस्कुराया फिर बोला ..... करता तो ......मैं ही रहूंगा तू बस ...."चर्चा "ही रहेगा सदियों से ..... "चर्चा" और "चर्चित" का खेल चल रहा कभी .....लुक्का छिप्पी वाला कभी .......गेंद बल्ले वाला कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें