कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0207

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लो आज फिर गुज़र गया

लो आज फिर गुज़र गया इक सुनसान सा दिन तुम्हारे लिए ...तुम्हारे बिन दिन भर अजनबी राह पर अटकता रहा सन्नाटा था फिर भी बेचैन ,बस भटकता रहा देखो .... सूने .....निराश दिनों का ढेर लग गया है ... ज़हन में जरा बोझ उतार जाओ न बस पल भर के लिए मिल जाओ न सिर्फ.... देख लूं सिर्फ ....पूछ लूं तुम कैसे हो ? बस इतना भर ही तो ..... चाहती .....हूँ हमेशा से चाहती .....थी इन वीरान पलों से इन सुनसान दिनों से अपने लिए ....बस तुम से कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें