भाषा / Language
क्या इनाम बक्शा है
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क्या इनाम बक्शा है ?
मेरे वजूद को ....
जो सतत
देहलीज़ के
अंदर और बाहर
लुढ़कता रहता है
घर में "घर" सा
बाहर उस "शहर " सा
बिना थके
बिना रुके
सिर्फ इस आशा में .....
की थोडा थोडा सही
पर अपना किरदार निभा रही हूँ
सारी न सही ....
पर कुछ एक घर की ईंटों में
अपनी मेहनत दबा रही हूँ
आँगन की तुलसी पर ....
बस कुछ बूंदें
अपने प्रयास की भी चढ़ा रही हूँ
मन ही नहीं .....
अपना तन भी
इस रिश्ते से बंधा रही हूँ
नाम ही नहीं .....
रिश्ता जोड़ कर आयी हूँ
तेरी देहलीज़ से .....
तेरे घर से ....
तेरी हर चीज़ से ......
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें