भाषा / Language
खलिश से , हम वास्ता नहीं रखते
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खलिश से , हम वास्ता नहीं रखते
वापसी का कोई , रास्ता नहीं रखते
दिन रात , बस लकीरों में ढूंढते हैं
हसरत , इस कदर बेसाख्ता नहीं रखते
लहज़े सरकाते हैं , पत्थर दिलों के
फिर दीवार से , राब्ता नहीं रखते
दिल में , दबा लेते हैं अधूरी ख्वाइशें
महफ़िल में , उन्हें नाचता नहीं रखते
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें