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रचना 0152

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खलिश से , हम वास्ता नहीं रखते

खलिश से , हम वास्ता नहीं रखते वापसी का कोई , रास्ता नहीं रखते दिन रात , बस लकीरों में ढूंढते हैं हसरत , इस कदर बेसाख्ता नहीं रखते लहज़े सरकाते हैं , पत्थर दिलों के फिर दीवार से , राब्ता नहीं रखते दिल में , दबा लेते हैं अधूरी ख्वाइशें महफ़िल में , उन्हें नाचता नहीं रखते
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें