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रचना 0145

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मुठ्ठी भर आकाश नहीं ,पूरा आसमान लूं

मुठ्ठी भर आकाश नहीं ,पूरा आसमान लूं सूरज से उस की , उजाले वाली दुकान लूं रात , लिखा करूँ , तारों पर अपनी दास्तान इसलिए, चाँद से वो खाली खाली मकान लूं Crazy crazy
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें