कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0140

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यादों का बाज़ार लगा है

यादों का बाज़ार लगा है हर याद सजी धजी बैठी है मुझमें और दिल है कि...... बच्चा हुआ जा रहा है हर याद इक बार और .....फिर से चखना चाहता है बीते पल इक बार और .......जेब में रखना चाहता है ज़हन में दबे दबे ये यादें अनमोल हो गयी है और ज़िद्दी दिल दोनों मुठ्ठियों में वक़्त की रेज़गारी लिए मोल पूछ रहा है हर याद इक बार .... फिर जीने के लिए कुछ बाकी था ...... वह कहने के लिए चाख जो थे ...... उन्हें सीने के लिए
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें