कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0130

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लफ्ज़

लफ्ज़.......... कुछ तेरे लफ्ज़ कुछ मेरे लफ्ज़ साथ चले बात कहलाये बातें करते लफ्ज़ , जुड़ गए जज़्बात कहलाये जज्बातों में उलझे लफ्ज़ , थक गए खामोश कहलाये ख़ामोशी में लिपटे लफ्ज़ , घुल गए आगोश कहलाये आगोश में डूबे लफ्ज़, बह गए अदा कहलाये अदा में रंगे लफ्ज़, छू गए अंदाज़ कहलाये अंदाज़ में ऊँचे लफ्ज़ , गूंज गए आवाज़ कहलाये आवाज़ में सच्चे लफ्ज़ , रुक गए विचार कहलाये विचार में पक्के लफ्ज़ , मंझ गए व्यवहार कहलाये व्यवहार में सिले लफ्ज़ , जड़ गए संस्कार कहलाये संस्कार में चुभते लफ्ज़ , चिढ गए तिरस्कार कहलाये तिरस्कार में लड़ते लफ्ज़ , गिर गए बेकार कहलाये बेकार में कहे लफ्ज़ , बिखर गए चुप्पी कहलाये चुप्पी में सारे लफ्ज़ खो गए फिर कहाँ कुछ कहलाये ? लफ़्ज़ों का शोर थम गया फिर ये किसने कहा ? उड़ते लफ्ज़ जब बंध जाएँ , कल्पना कहलाये कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें