कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 0109

भाषा / Language

इस बिन मौसम की

इस बिन मौसम की बरसात का गीलापन कइयों के आने वाले दिनों को भीगा गया है उस किसान का हरा भरा फख्र बह गया है अभी अभी वो आम के पेड़ों पर बौराया सा बौर जिक्र भर रह गया है सुना है अभी अभी आस का फूल विश्वास का फल सब दब गए हैं इक बौछार में अब खिल न सकेंगे फिर से कभी और तो और वो "सूरज" भी मध्यम कर चुका है अपनी लौ इस असमंजस में कि कल भीगा भीगा जल भी सकूंगा ? कि कल भी नहीं ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें