भाषा / Language
इस बिन मौसम की
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इस बिन मौसम की
बरसात का गीलापन
कइयों के
आने वाले दिनों को
भीगा गया है
उस किसान का
हरा भरा फख्र
बह गया है अभी अभी
वो आम के पेड़ों पर
बौराया सा बौर
जिक्र भर रह गया है
सुना है अभी अभी
आस का फूल
विश्वास का फल
सब दब गए हैं
इक बौछार में
अब खिल न सकेंगे
फिर से कभी
और तो और
वो "सूरज" भी
मध्यम कर चुका है
अपनी लौ
इस असमंजस में
कि कल भीगा भीगा
जल भी सकूंगा ?
कि कल भी नहीं ?
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें