भाषा / Language
ऐसे भी कुछ ख्वाब
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ऐसे भी कुछ ख्वाब .....
हाँ .........है न
कल्पना की पाठशाला में
ऐसे भी कुछ ख्वाब
बेअदब , ज़िद्दी से
वो जो प्रायः बिलकुल पीछे
विराजमान रहते हैं
बेफिक्र से ..... मुझमें आवाज़ करते हुए
जहाँ चाहें विशवास लिखते हुए
बेखौफ से .....धूनी जमाये मलंग से
छुओ तो बिजली की तरंग से
बद्तमीज़ से .....बस प्रयास के नशे में चूर
फिर भी ज़िन्दगी से भर पूर
बेशर्म से ..... गिर गिर कर भागते हुए
हर हार को नापते हुए
बेसब्र से.....असफलता को मुट्ठी में भींचने वाले
"अब की देख लेंगे "कहने वाले
कई बार मैं थक जाती हूँ
इनकी उत्तेजनाओं ,
आशाओं को
ढोते ढोते
जी करता है ........
बस मुतमईन कर दूं इन्हें
चुप्पी ढँक दू इन पर
इनकी बेअदबी पर
सन्नाटे का ताला लगा दूं
विक्षत कर दूं इनकी परवाज़
खामोशियों को दे ही दूं इनकी आवाज़
पर ये "मसखरे ख्वाब "
झट मुझे गोद में उठा लेते हैं
"शरारती ये ख्वाब "
मुझे गुदगुदा देते है
और
ज़ोर ज़ोर से गाते हैं .......
"जीत जाएंगे हम ....तू अगर संग है "
नाचते हैं मेरे इर्दगिर्द
बस मैं फ़िदा हो जाती हूँ
मुस्कुराती रह जाती हूँ
कल्पना पाण्डेय
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें