भाषा / Language
अरे यार "अलफ़ाज़
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अरे यार "अलफ़ाज़"
तुम भी "दिलबर" हो गए हो
कभी मुस्कुराकर कर
झर - झर गिरते जाते हो मुझ पर
कभी लाख कोशिशों के बावजूद
रूठे रहते हो
मुझ पर बरसते नहीं
कुछ कहते नहीं
बिलकुल बहते नहीं .
Kalam aur kalpana ki kalpana ko aaj kuch nahi soojh raha . 😞😞😞😞😛😛😛😛😛
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें