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रचना 0095

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अरे यार "अलफ़ाज़

अरे यार "अलफ़ाज़" तुम भी "दिलबर" हो गए हो कभी मुस्कुराकर कर झर - झर गिरते जाते हो मुझ पर कभी लाख कोशिशों के बावजूद रूठे रहते हो मुझ पर बरसते नहीं कुछ कहते नहीं बिलकुल बहते नहीं . Kalam aur kalpana ki kalpana ko aaj kuch nahi soojh raha . 😞😞😞😞😛😛😛😛😛
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें