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रचना 0093

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वक़्त नहीं

वक़्त नहीं ..... ये यादों के उजाले जाने कौन सी उम्मीद लिए मेरा दर खटखटा रहे हैं ? जानते है ..... कि मुझमें छाया हुआ है "कोहरा" मसरूफियत का , भागती दौड़ती ज़िन्दगी का वक़्त ही नहीं कि मैं वो अपनापन दे सकूँ वही पुराना दीवानापन दे सकूँ वजह भी नहीं अब जगह भी नहीं तितलियों सी यादों को सजाने के लिए सिरहाने में बसाने के लिए फिर किस्मत आज़माने के लिए एक बार फिर दूर जाने के लिए
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें