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रचना 0078

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खुश है मेरी बुलंदी से

खुश है मेरी बुलंदी से , सिक्का क्या ? चाँद हथेली धर देगी रूठी कहाँ नादानी से ? बहुत हुआ जब... हल्का चांटा जड़ देगी मेरी खरोंच को जख्म बता ..वो मोहल्ला इकठ्ठा कर देगी मेरी मायूस दरारें देख बस आँचल से चुपके ढँक देगी लट्टू है ,मेरी बातों की हर बात पे हामी भर देगी ममता दे दे दुआ भी दे नाम मेरे सब कर देगी मुश्किल हो या उलझन कोई खुद को आगे कर देगी बस इक ही ख्वाइश उसकी हर बार मुझे जनम देगी
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें