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रचना 0072

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हम रीते लगते हैं

हम रीते लगते हैं.... आंसूं पीते ही जज़्बात टपकते हैं , जज़्बात पीते ही आंसूं दोनों मेरी सुनते नहीं कभी आंसूं थमते नहीं कभी जज़्बात रुकते नहीं कैसे कहूँ ? ये मेरे बस में नहीं फिर तुम कहते हो ...... हम रीते लगते हैं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें