भाषा / Language
हम रीते लगते हैं
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हम रीते लगते हैं....
आंसूं पीते ही
जज़्बात टपकते हैं ,
जज़्बात पीते ही
आंसूं
दोनों
मेरी सुनते नहीं
कभी आंसूं
थमते नहीं
कभी जज़्बात
रुकते नहीं
कैसे कहूँ ?
ये मेरे
बस में नहीं
फिर तुम कहते हो ......
हम रीते लगते हैं
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें