कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0068

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" प्रश्न "हर वर्ष का

" प्रश्न "हर वर्ष का ....... आज मेरा शहर बिजली में नहा रहा है, हर घर नया आँगन चमचमा रहा है, मन कितनों ने बुहारा इस बार ? " प्रश्न " हर वर्ष का आज भी सता रहा है रिश्तों को तोहफा सहला रहा है , कोई कुछ भी नहीं कोई कितना कुछ पा रहा है , त्यौहार या तृष्णा का कारोबार ? " प्रश्न" हर वर्ष का आज भी सता रहा है किसी का आम दिन , कोई लाखों उड़ा रहा है कोई सिर्फ उम्मीद , कोई ऐश्वर्य दिखा रहा परमार्थ का इक दीप मन के लिए नहीं? " प्रश्न "हर वर्ष का आज भी सता रहा है कागज़ में रौशनी संग आवाज़ बाँध रहा है खुद आग है और धमाका मांग रहा है खुशियां फैला , विष नहीं त्यौहार बना ...व्यापार " प्रश्न "हर वर्ष का आज भी सता रहा है
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें