भाषा / Language
सृजन निखार
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सृजन निखार.......
( दोहे )
चंदा ढूंढे चाँदनी , सूरज खोजे भोर
पिया बसे परदेश हैं , अंधियारा चहुँ और
अपने पी की क्या कहूँ ,वो कैसे चित्त चोर
प्रेम पाश में बाँध के ,खींचे अपनी ओर
पीड़ प्रेम की है बुरी ,पल पल है तड़पाय
आस मिलन की रह गयी , गया प्रेम कुम्हलाय
धीरे धीरे अब भला ,कछु ना होता काज
सब्र पुराना हो गया , वक़्त नया सरताज
माली मेरा बांवरा ,कोशिश करता जाय फलदायी या ठूंठ हूँ ,पानी देता जाय
हौले हौले रे मना तू भी तो कुछ बोल
ऐसा मौका ना मिले राज़ दिलों के खोल
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें