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रचना 0051

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इस वक़्त से लड़कर भी क्या करूँगा

इस वक़्त से लड़कर भी क्या करूँगा जीत भी गया तो ,तारिख मैं क्या लिखूंगा जो खुद मुट्ठी से फिसल रहा है , रेत बनकर उसके आगे सर झुका कर , मैं क्या करूँगा मरासिम नहीं , जिसके जज़्बातों यादों से बादशाह था कि फ़क़ीर , जताके मैं क्या रहूँगा अंधेरों में तनहा सा जम जाता है जो खुद ही आगे ऐसों के ,फलसफा ज़िन्दगी मैं क्या कहूँगा सुख दुःख की जो खुद लेता हो करवटें , उम्र भर माथे उसके अपनी सलवटे बढाके, मैं क्या हंसूंगा बदलना ही जिसकी फितरत है , तो फिर ऐ खुदा वक़्त बेवक़्त सजदे में ,इसकेलिए मैं क्या झुकूंगा मुकम्मल रहूँ या जर्रा जर्रा बिखर जाऊं मैं वक़्त की नहीं ,मेरी कुव्वत है ,की मैं क्या बनूँगा
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें