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रचना 0049

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सौ सौ नखरे ना दिखा कर ले झटपट काम आज जरा कुछ सीख ले कल करन…

सौ सौ नखरे ना दिखा कर ले झटपट काम आज जरा कुछ सीख ले कल करना आराम रिश्ता मेरी सोच का कागज़ को भी भाय जब भी सुन्दर मैं लिखूं कलम यही इतराय ऐसी बातें ना करो होता रहता काम आज मिली कल ना मिले दोहों वाली शाम फल बड़ा हमें चाहिए जैसे हो तरबूज सोच बदली बदल गए कहलाये खरबूज घड़ा उठाकर मैं चली तू क्यूँ पीछे आय नज़रें मुझपर गढ़ रही घड़ा मंद मुस्काय सींचूँ सपना प्रीत का लिखकर सुन्दर गीत कागज़ कलम दवात ला ये मेरे भी मीत सब को सब कुछ चाहिए ज़िद है या कि लगाव राग द्वेष सब भर लिया दम्भ भरी ये नाव Aaj kuch dohe rache i mean likhna seekha
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें