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रचना 0048

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दिल से छलक कर वो , आँखों तक आ गया

दिल से छलक कर वो , आँखों तक आ गया शिकवा बरस कर बूंदों सा, गालों पे आ गया अँधेरा सरकता हुआ क्यों ,जिंदगी में समां गया पहले मुझे निगला , फिर मेरी परछाई खा गया फूंक कर पुरानी याद , हमको जिलाना आ गया गीले खतों को , मुझ सा , आंसू छिपाना आ गया ज़िन्दगी की बिसात पर ,प्यादे हिलाना आ गया शुक्र है , अब तो हमे रिश्ते निभाना आ गया चिकनी ख्वाइशें ,शायद हम पे दिल आ गया जो कुछ चाहा वक़्त से , झोली में आ गया
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें