भाषा / Language
दिल से छलक कर वो , आँखों तक आ गया
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दिल से छलक कर वो , आँखों तक आ गया
शिकवा बरस कर बूंदों सा, गालों पे आ गया
अँधेरा सरकता हुआ क्यों ,जिंदगी में समां गया
पहले मुझे निगला , फिर मेरी परछाई खा गया
फूंक कर पुरानी याद , हमको जिलाना आ गया
गीले खतों को , मुझ सा , आंसू छिपाना आ गया
ज़िन्दगी की बिसात पर ,प्यादे हिलाना आ गया
शुक्र है , अब तो हमे रिश्ते निभाना आ गया
चिकनी ख्वाइशें ,शायद हम पे दिल आ गया
जो कुछ चाहा वक़्त से , झोली में आ गया
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें