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रचना 0042

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अपने "माज़ी "के चिपके औराक

अपने "माज़ी "के चिपके औराक को पलट के देखो फूंक मारो .....कुछ है .... जिला के देखो उस मुड़े सफ़्हा के नीचे तुम्हारी "मुहब्बत "है अगर सोई है तो .....उठा के देखो उठी है तो ......सहला के देखो एक बार फिर इश्क करके देखो आज उन औराक को उड़ा कर देखो माज़ी से दिल लगा के देखो
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें