कल्पनाशब्दों के बीच
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रचना 0041

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तुझ से उठकर ,तुझमें ही डूब जाती हूँ

तुझ से उठकर ,तुझमें ही डूब जाती हूँ ये जूनून है ,तू तो इश्क ही बताएगा दिल सुन्न है ,नब्ज़ कुछ कहती नहीं क्या तूने कहा मुझमें ठहर ही जायेगा ? मासूम से ख्वाब हैं , जिद्दी बहुत बुलबुलों का महल ,सब्र से ही पायेगा सुराखों वाला हो गया है ,इंसानी दिल जिसे देखो ,"खाली नज़र " ही आएगा जीकर सीखना मुश्किल है बहुत सीखकर जिया ,तो बूढ़ा हो जाएगा
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें