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रचना 4537

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सब कोई तो तैयार है युद्व के लिए सिवाय उसके

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सब कोई तो तैयार है युद्व के लिए सिवाय उसके ... वो स्त्री तैयार है पल्लू खोंसे हुए भूख- प्यास और रिश्तों के प्यादों को बुहारते सजाते हुए घर को छोटे बड़े कीट पतंगों और दुःख से बचाए रखने में वो मासूम बस्ता बंद तैयार है अक्षर और अंक की जंग लड़ने के लिए उस शिल्प को सीखने के लिए जो भविष्य के उसके चक्रव्यूह को भेद सके। वो पुरुष तैयार है रोजी रोटी का चक्का उठाये रात और दिन को अपने हाथों से दिशा देता हुआ युद्ध का पहला और आखरी शंखनाद बजाता हुआ धरती ,आकाश ,नदी,पंछी, पहाड़, रेत, दरख़्त ,पशु सब के पास अपने युद्ध हैं सभी तो युद्ध रत हैं सिवाय उस कवि के ... जो युद्ध स्थिर है वो खड़ा है ख़ाली हाथ अपने लिए नहीं.... बस उस कविता के लिए अन्तस् का घमासान सबके हिस्से का लिखते हुए उसके अदृश्य अस्त्र हैं.... उसके पास भाषा है और एक युधिष्ठिर मन है।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें