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हमें देखने की जल्दी रहती है

हमें देखने की जल्दी रहती है हम बहुत सारा एक बार में देख लेना चाहते हैं। फिर उस देखे को सरीखे से लगाना ....फिर से देखना ....एक दुश्वार काम है। बस इसीलिए उलझ जाते हैं। जैसे ऊन के कई रंगों के गोले हाथों में भर लिए हों और संभल कोई न रहा हो। कभी कोई गिरे कभी कोई .... उठाकर पुनः लाने में ही स्मृतियों का जाल तैयार होता जाता है .... हम खुद बचते बचाते फंस कर गिरते जाते हैं। भूलने से शुरू करते हैं याद किया जाना। इसलिए कहती हूं.... ठूंठ से किया करो प्रेम ... कि बहार का न सुख दिखे न पतझड़ का दुःख। कम देखो... कम दिखाओ कि एक सरीखा रहे प्रेम .... सुंदर ,सरल, सदा तुम्हारी तरह..... *तस्वीर के लिए Jaimitra Singh Bisht sir को दिल से शुक्रिया।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें