भाषा / Language
अब ये सोच कर खुद पर हंसी आती है कि मैंने कितने सादे शख्स के…
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अब ये सोच कर खुद पर हंसी आती है कि मैंने कितने सादे शख्स के लिए अपनी हंसी बरसों तक रोके रखी और आंसू लगातार बहने दिए। ये मेरा प्रेम था जो उसे दिलकश बनाए हुए था। वो कितना कंप्लीट था मेरे मानसपटल में और अब कितना vague.
गिविंग और टेकिंग की पारी में giver ही विजयी माना जाता है। वो तो शायद कहीं नहीं था। पर मैं थी .... पूरी .... सारी की सारी।
अब उसको देखती हूं तो लगता है दो खाली हाथ और भरे दिल का इंसान कितना भी मुस्कुरा ले... असर नहीं छोड़ता।
मुझे तो चुभेगा ही।
जादू मेरा था उस पर और एक रोज़ मैंने खींच लिया वापस ।
अब वो बस है।
चमकते पत्थर के बराबर ।
मेरी बात और है अब .....
पहले आधा चांद थी ...
अब टूट कर हर टुकड़ा
लश्कारे मारता है।
साथ तारे और दामन में जड़ लिए हैं।
जो दुख कर उठता है वो मर नहीं सकता ।
मैं तुम्हारे लिए अपने प्रेम की बात कह रही।
तुम्हारी नहीं।
पर अब भी कहूंगी...
रहना तुम।
*कहानी साइलेंट सेपरेशन का एक अंश।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें