भाषा / Language
आप से मिलके हम कुछ बदल से गए
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आप से मिलके हम कुछ बदल से गए...
*लिखते वक्त...
उंगलियों में नूपुर बंध जाते हैं ...
मन थिरकता है और पैर नहीं रहते ।
उड़ान वो नहीं जो तुम्हें मुक्त कर दे
उड़ान वो है जो तुम्हें शून्य कर दे।
अपने एकांत को छू कर खुद में घूमर करना है ....लिखना
लिखना मेरे लिए शौक नहीं ...जोंक है मेरे मन की।
*हेडफोन पर राहत जी नुसरत जी यही गा रहे।मुस्कान वही सुनकर आ रही।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें