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तुम को अब देखती हूं तो लगता है सुंदर हुआ कि तुम को दरिया कहा

तुम को अब देखती हूं तो लगता है सुंदर हुआ कि तुम को दरिया कहा समुंदर नहीं ... तुमको लौटना था... मुझसे उतरना था .... ठहरना नहीं। मैंने भी सहूलियत दे दी। दुःख ये रहा कि तुम कुछ न दे पाए। ना नाम ना लौटने का पता ना सहूलियत
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें