कल्पनाशब्दों के बीच
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छुट्टियां हैं स्कूल की । सच कहूं घर पर समय बिताना वाकई मुश्…

छुट्टियां हैं स्कूल की । सच कहूं घर पर समय बिताना वाकई मुश्किल काम है । कुछ ही देर में क्या करूं ? क्या करूं? होने लगती। शायद वर्किंग वुमन होने के साइड इफेक्ट्स हैं ये। आज कल ये मेरे साथी बने हुए। इनके साथ दुख सुख लगाए रखती हूं। इनको देखती हूं तो लगता है हरा बनाए रखना खुद को आसान नहीं । और सूखे होकर हरा होना तो और भी मुश्किल । स्पर्श की भाषा पढ़ते हैं ये .... इनको healer कहती हूं। दिल्ली की गर्मी में इनको हंसते हुए देखती हूं तो लगता है.... प्यार से छू लो तो क्या नहीं पनप सकता । हर कोई तवज्जो ही तो चाहता है। हर कोई वक्त ही तो चाहता है। दे दो ... अगर दे सकते हो। तुम्हारा तुम तक ही लौटेगा।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें