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कभी कभी बहुत दुखने के बाद भी उसी के गले लगने का मन करता है…

कभी कभी बहुत दुखने के बाद भी उसी के गले लगने का मन करता है जिसने तुम्हें दुखाया हो। आप भूल जाना चाहते हो दुखना पर फिर भी.... आप नोच नहीं पाते उस इंसान को खुद से। इस पीड़ा को प्रेम कहा जा सकता है। लहूलुहान होकर भी यकीन नहीं आता कि पत्थर पड़ चुका है।मिट्टी दी जा चुकी है। मन मनाना सबसे बड़ा शोक गीत है। उदासी उदास करती है .....आहिस्ता आहिस्ता तुम्हारी।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें