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उसे नींदें बंजर कर देने का हुनर था

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उसे नींदें बंजर कर देने का हुनर था.... वो कभी ओक से पीता ,कभी बस चखता, कभी बस स्पर्श करता, कभी पूरे नशे में धुत्त कर देता। वो ऐसा जादू जानता था ..... देर तक भीगते रहना जानते हो बिना बारिश के ?किसी अधूरे लिखे नाम को चूम कर देखा है कभी? किसी धूप किसी छांव का मिजाज़ अदल बदल किया है कभी?कहीं से उड़ कर कहीं और बैठे रह गए हो कभी? ये सारी नादानियां उसके साथ ही सोची जा सकती हैं। उसे मेरा प्यार पहुंचे। *पाबंदियां खुद माँग कर ली हैं.... इस आज़ाद रूह ने तुम्हारे लिए
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें