भाषा / Language
हमें लगता है कि हम ईश्वर से माँगते रहते हैं।
✦
हमें लगता है कि हम ईश्वर से माँगते रहते हैं।
आँख बंद करके पीछे देखती हूँ तो पाती हूँ ईश्वर ही हमसे बहुत सारा माँग ले गया है।
पुराने दुःख को कुछ दिन बाद में देखो तो दुःख लगता ही नहीं। वक़्त फूंक मारता ही इस लिए है कि सुख दुख उड़ते बैठते रहें।
और वो जो दूर बैठा है वो ईश्वर वो परत चढ़ाना जानता है ।कारीगरी इसी बात की है कि पीतल और सोना हम होते रहते हैं। उसका माँगना कम नहीं होता। हमारा जीना कम नहीं होता।
वो भी बही फाड़ता लिखता रहता है। हम भी उसी बही में अंगूठा मारते रहते हैं। माँगते रहते हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें