भाषा / Language
समीकरण....मेरी नज़र से
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समीकरण....मेरी नज़र से
*स्त्रैण एक असीम यात्रा है...
स्त्री और पुरुष उसके यात्री ।
कम ज्यादा कुछ नहीं होता
यात्रा पूरी होती है।
*तुम्हारे पीछे चलूँगी कहने भर से मैं पीछे नहीं होती .....मैं प्रीत में कहीं आगे चल रही होती हूँ।
तुम मुझसे आगे इस लिए भी चलते हो कि मेरी नज़र बस तुम तक रहे।
प्रीत तुम्हारी मेरी आगे रहेगी हमसे।
*ईश्वर को हम में बसना था...
उसने मुझे पुरुष दिया
तुमको स्त्री
प्रेमिल ईश्वर हमारे बीच उग गया।
*स्त्री पुरुष कुछ नहीं होता...
आरुष होता है
एक दूसरे से
एक दूसरे का
एक दूसरे में
*साँझा हो सकने की नेमत और नियत आपको पुरुष बनाती है....
अब स्त्री लिख कर रेखाँकित क्या करूँ ... पुरुष को
और पुरुष लिख कर क्या मिटाऊं स्त्री को
*हम अवकाश में रहें या आकाश में....
तुम्हारे तो काश में ही रहेंगे।
तुम हो नहीं सकते मेरे बिना
*हम दो पारस हैं...जो एक दूजे को परिष्कृत करते रहते हैं।
अलग अलग हम बस दो टुकड़े हैं ।
😊😊😊😊
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें