कल्पनाशब्दों के बीच
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दो तीन दिन से नींद धोखा दे रही।

दो तीन दिन से नींद धोखा दे रही। लग रहा एक आवाज़ कानों में गूंज रही। मन की डोर खोलने की कोशिश में Pankaj Chaturvedi जी की किताब पढ़ रही। बेहद शानदार कविता और कथन से भरी इस किताब से लेप लग रहा।मन फिर आकार ले रहा। अभी तक की पढ़ी बातों पर मन जो जो बोलता गया... लिख दिया है। अभी कुछ पृष्ठ बाकी हैं। सुंदर और सार्थक किताब के लिए पंकज जी और रूख प्रकाशन को बधाई। शुक्रिया अनुराग वत्स।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें