कल्पनाशब्दों के बीच
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फ़िज़ूल कांच हैं बहुत

फ़िज़ूल कांच हैं बहुत .... इक फ़ाज़िल हीरा तलाश रही हूँ। प्रेम अगर दोस्ती की पंखुड़ियों से ढंका हुआ हो तो एक दिन गुलाब हो जाता है। *अब कुछ दिनों के लिए विराम। मुस्कुराते रहिए। मिलती हूं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें