कल्पनाशब्दों के बीच
भाषा / Language
सभी रचनाएँ

रचना 4216

भाषा / Language

बरबस प्रेम में पड़ गई तुम्हारे

बरबस प्रेम में पड़ गई तुम्हारे फिर एक रोज़ छूटने का दुःख भी जाता रहा। दोनों में मिट्टी तुम्हारी थी और मठ्ठा भी। मैं पहले भी खाली हाथ थी अब भी ठूंठ हूं। पर स्थिर हूं...प्रेम में इन कविताओं में मिले भी तुम बिछड़े भी तुम ही। मैं शून्य में समाती रही।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें