कल्पनाशब्दों के बीच
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जितनी बेअदबी से वो इश्क़ लिखती है

जितनी बेअदबी से वो इश्क़ लिखती है उतने ही सलीके से वो उदासी कह देता है। वो पूरब को उसकी गंध कहती तो वो पश्चिम उसकी पीठ को कह देता उत्तर वो उसके हँसते ख़तों को कहती तो दक्षिण वो उसके जाते हुए पैरों की छाप को नाम देता वो प्रेम से दिशाएँ तय करते थे। उनके बीच प्रेम बहता नहीं ,प्रार्थनाओं की तरह रुका हुआ था। वे एक दूसरे की अनुगूंज थे .... पुकारो तो ... पुकारो तो सही एक बार इश्क़ ... देखो वो लौटेंगे जरूर। इश्क़ ....अहा तुम!
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें