कल्पनाशब्दों के बीच
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देखोगे तो

देखोगे तो ... मेरे तुम्हारे बीच सैंकड़ों परिंदे हैं .... सुख वाले भी ... दुख वाले भी ये अलग बात है कि तुम तब भी अपना आकाश नीला और मैं अपना दरख़्त हरा ही रखती हूं। परिंदो को आने जाने की सहूलियत रहती हैं। हम भी संग ठीक ठाक लग ही जाते हैं।
कल्पना पाण्डेय की फेसबुक लेखन-यात्रा सेसंग्रह में लौटें